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UP MLC Election Results 2026: उत्तर प्रदेश की 11 विधान परिषद सीटों पर भाजपा ने छह सीटें जीतीं, लखनऊ और आगरा में सपा की जीत से बदले सियासी समीकरण; 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ी हलचल

UP MLC Election Results 2026: उत्तर प्रदेश की 11 विधान परिषद सीटों पर भाजपा ने छह सीटें जीतीं, लखनऊ और आगरा में सपा की जीत से बदले सियासी समीकरण; 2027 विधानसभा चुनाव से पहले बढ़ी हलचल

लखनऊ। उत्तर प्रदेश में विधान परिषद की शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों की 11 सीटों पर हुए चुनाव ने प्रदेश की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। भारतीय जनता पार्टी ने छह सीटों पर जीत दर्ज कर अपना पिछला आंकड़ा बरकरार रखा है, लेकिन समाजवादी पार्टी ने लखनऊ और आगरा जैसी महत्वपूर्ण सीटों पर सफलता हासिल करके मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 की शाम तक घोषित परिणामों में भाजपा के छह और समाजवादी पार्टी के चार उम्मीदवार विजयी हो चुके थे। वाराणसी-मिर्जापुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मतगणना जारी थी, जहां समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार आशुतोष सिन्हा बढ़त बनाए हुए थे। यदि यह सीट भी सपा के खाते में जाती है, तो अंतिम आंकड़ा भाजपा की छह और समाजवादी पार्टी की पांच सीटों का हो जाएगा।

उत्तर प्रदेश विधान परिषद के इन चुनावों को राजनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण ऐसा आकलन किया जा रहा है, क्योंकि वर्ष 2027 में प्रदेश में विधानसभा चुनाव प्रस्तावित हैं। हालांकि शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के मतदाता सामान्य विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों से अलग होते हैं, फिर भी इन चुनावों के नतीजे राजनीतिक दलों के संगठन, उम्मीदवार चयन और शिक्षित मतदाता समूहों में उनकी पहुंच का संकेत देते हैं। इसी कारण भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों इन परिणामों का अपने-अपने स्तर पर आकलन कर रही हैं।

प्रदेश की जिन 11 विधान परिषद सीटों पर चुनाव हुए, उनमें पांच स्नातक निर्वाचन क्षेत्र और छह शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र शामिल हैं। स्नातक कोटे की सीटों में लखनऊ, आगरा, मेरठ, इलाहाबाद-झांसी और वाराणसी-मिर्जापुर शामिल हैं। वहीं शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में लखनऊ, आगरा, मेरठ, बरेली-मुरादाबाद, वाराणसी और गोरखपुर-फैजाबाद की सीटें शामिल हैं। इन निर्वाचन क्षेत्रों में मतदान और मतगणना की प्रक्रिया सामान्य विधानसभा चुनावों से अलग होती है। विशेष रूप से वरीयता आधारित मतदान प्रणाली की वजह से कई सीटों पर मतगणना लंबी चली।

भारतीय जनता पार्टी ने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में चार सीटें जीतकर अपना मजबूत प्रदर्शन जारी रखा। लखनऊ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा के उमेश द्विवेदी ने लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की। उनकी सफलता को पार्टी के उद्देश्य से महत्वपूर्ण ऐसा आकलन किया जा रहा है, क्योंकि लखनऊ शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा अपना प्रतिनिधित्व बनाए रखने में सफल रही। दूसरी ओर, इसी शहर की स्नातक सीट पर पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, जिससे राजधानी में दोनों प्रमुख दलों का मिला-जुला प्रदर्शन सामने आया।

मेरठ में भाजपा ने शिक्षक और स्नातक दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में जीत दर्ज की। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से श्रीचंद शर्मा दूसरी बार विजयी हुए, वहीं स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से दिनेश गोयल ने जीत हासिल की। मेरठ की दोनों सीटों पर सफलता भाजपा के उद्देश्य से राहत देने वाली रही। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में पार्टी ने अपने संगठन और उम्मीदवारों के माध्यम से दोनों निर्वाचन क्षेत्रों में जीत दर्ज की।

बरेली-मुरादाबाद शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी डॉ. हरि सिंह ढिल्लों विजयी रहे। उन्होंने समाजवादी पार्टी के प्रत्याशी हाजी दानिश अख्तर को बड़े अंतर से हराया। इस सीट पर भाजपा की सफलता ने शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में पार्टी के कुल प्रदर्शन को मजबूत किया। इसी प्रकार आगरा स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा प्रत्याशी डॉ. मानवेंद्र प्रताप सिंह ने जीत हासिल की। आगरा में भाजपा स्नातक सीट बचाने में सफल रही, लेकिन शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में उसे समाजवादी पार्टी से हार का सामना करना पड़ा।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के राजनीतिक प्रभाव वाले गोरखपुर क्षेत्र की शिक्षक विधान परिषद सीट पर भी भाजपा उम्मीदवार ध्रुव त्रिपाठी विजयी हुए। हालांकि इस सीट पर मुकाबला आसान नहीं रहा। निर्दलीय प्रत्याशी राजीव यादव ने उन्हें कड़ी चुनौती दी। मतगणना के समय दोनों उम्मीदवारों के बीच अंतर कम रहा और वरीयता मतों की गणना महत्वपूर्ण साबित हुई। अंततः ध्रुव त्रिपाठी जीत दर्ज करने में सफल रहे। इस मुकाबले ने दिखाया कि भाजपा के प्रभाव वाले क्षेत्रों में भी कुछ सीटों पर कड़ी प्रतिस्पर्धा नजर आई।

दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी ने इस चुनाव में कई महत्वपूर्ण सफलताएं हासिल कीं। लखनऊ स्नातक निर्वाचन क्षेत्र से सपा प्रत्याशी कांति सिंह पटेल ने भाजपा के अवनीश कुमार सिंह को हराकर जीत दर्ज की। यह सीट पहले भाजपा के पास थी। राजधानी की स्नातक सीट पर सत्ता पक्ष को हराना समाजवादी पार्टी के उद्देश्य से राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण परिणाम ऐसा आकलन किया जा रहा है। इस जीत के पश्चात लखनऊ में स्नातक मतदाताओं के बीच दोनों दलों की चुनावी रणनीतियों और उम्मीदवार चयन के सिलसिले में चर्चा तेज हो चुकी है।

लखनऊ स्नातक निर्वाचन क्षेत्र का परिणाम सामाजिक समीकरणों की दृष्टि से भी चर्चा में रहा। भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों ने कुर्मी समुदाय से संबंधित उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। भाजपा के अवनीश कुमार सिंह के मुकाबले सपा की कांति सिंह पटेल ने जीत दर्ज की। इस परिणाम को किसी एक समुदाय के सभी मतदाताओं की राजनीतिक पसंद का प्रमाण नहीं माना जा सकता, लेकिन उम्मीदवार चयन और स्थानीय समर्थन के संदर्भ में इसका महत्व जरूर है।

आगरा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के डॉ. आकाश अग्रवाल ने जीत हासिल की। इस सीट का परिणाम विशेष रूप से चर्चा में है, क्योंकि आकाश अग्रवाल का राजनीतिक संबंध पहले भाजपा से रहा है। वह पिछला चुनाव निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जीत चुके थे और बाद में भाजपा में शामिल हुए थे। इस बार भाजपा से टिकट नहीं मिलने के पश्चात उन्होंने समाजवादी पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीत दर्ज की। आगरा शिक्षक सीट का यह परिणाम उम्मीदवार चयन और स्थानीय राजनीतिक समीकरणों के लिहाज से महत्वपूर्ण ऐसा आकलन किया जा रहा है।

आकाश अग्रवाल की जीत से समाजवादी पार्टी को आगरा में एक महत्वपूर्ण सफलता मिली, वहीं भाजपा के उद्देश्य से यह सीट संगठनात्मक समीक्षा का विषय बन गई है। चुनाव परिणामों के पश्चात यह सवाल उठ रहा है कि स्थानीय स्तर पर उम्मीदवारों की स्वीकार्यता और पार्टी नेतृत्व के फैसलों ने मतदान को किस हद तक प्रभावित किया। हालांकि किसी एक कारण को इस परिणाम के उद्देश्य से निर्णायक मानने से पूर्व विस्तृत चुनावी आंकड़ों और स्थानीय परिस्थितियों का आकलन आवश्यक होगा।

समाजवादी पार्टी ने इलाहाबाद-झांसी स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में भी जीत दर्ज की। इस सीट से डॉ. मान सिंह यादव विजयी हुए। उनकी जीत ने स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में सपा के प्रदर्शन को मजबूती दी। पार्टी के उद्देश्य से यह परिणाम इसी वजह से भी महत्वपूर्ण है क्योंकि इन चुनावों में स्नातक मतदाताओं के बीच राजनीतिक दलों की पकड़ का परीक्षण होता है। इस बार सपा ने कई ऐसे क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धी प्रदर्शन किया जहां भाजपा का प्रभाव माना जाता रहा है।

वाराणसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में समाजवादी पार्टी के लाल बिहारी यादव ने जीत दर्ज की। इस क्षेत्र में सपा की सफलता ने पूर्वांचल की राजनीति में भी चर्चा बढ़ाई है। वाराणसी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र है, हालांकि विधान परिषद का शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र अलग मतदाता समूह और भौगोलिक व्यवस्था पर आधारित होता है। इसी वजह से इस परिणाम को लोकसभा या विधानसभा के संभावित परिणामों के समान नहीं माना जा सकता। फिर भी स्थानीय संगठन और शिक्षक मतदाताओं के समर्थन के लिहाज से यह सपा के उद्देश्य से महत्वपूर्ण जीत रही।

वाराणसी-मिर्जापुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में बुधवार शाम तक मतगणना जारी थी। समाजवादी पार्टी के आशुतोष सिन्हा इस सीट पर आगे चल रहे थे। यदि वह जीत दर्ज करते हैं, तो समाजवादी पार्टी का कुल आंकड़ा पांच सीटों तक पहुंच जाएगा। इस स्थिति में भाजपा छह और सपा पांच सीटों पर रहेगी। हालांकि मतगणना पूरी होने और आधिकारिक परिणाम घोषित होने से पूर्व किसी उम्मीदवार की बढ़त को अंतिम जीत नहीं माना जा सकता।

विधान परिषद चुनाव में भाजपा के प्रदर्शन को देखें तो पार्टी ने कुल छह सीटें जीतकर अपना पिछला आंकड़ा बनाए रखा है। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में चार और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में दो सीटों पर जीत हासिल की गई। दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में दो और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में दो सीटें जीत चुकी थी, वहीं एक स्नातक सीट पर आगे थी। इस प्रकार दोनों दलों के बीच मुकाबला कई क्षेत्रों में करीबी रहा।

चुनाव परिणामों के पश्चात भाजपा के भीतर भी समीक्षा की बात प्रकाश में आई है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने लखनऊ और आगरा जैसी सीटों पर समाजवादी पार्टी की जीत के सिलसिले में प्रतिक्रिया दी। उन्होंने माना कि कुछ स्थानों पर सपा को ऐसी सफलता मिली है जिसकी भाजपा को अपेक्षा नहीं थी। इसके संग उन्होंने चुनाव परिणामों की समीक्षा करने की बात कही। इससे संकेत मिलता है कि पार्टी संगठन संबंधित सीटों पर हार की वजह सेों का विश्लेषण करेगा।

भाजपा के उद्देश्य से लखनऊ स्नातक और आगरा शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों के परिणाम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं। लखनऊ में पार्टी अपनी पहले से मौजूद सीट नहीं बचा सकी, वहीं आगरा में पूर्व में भाजपा से जुड़े रहे उम्मीदवार ने सपा के टिकट पर जीत दर्ज की। इन दोनों परिणामों के पश्चात उम्मीदवार चयन, स्थानीय संगठन और मतदाता संपर्क की रणनीति पर चर्चा स्वाभाविक है। हालांकि भाजपा की छह सीटों पर जीत यह भी दर्शाती है कि पार्टी ने कई क्षेत्रों में अपना समर्थन बनाए रखा।

गोरखपुर शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र का करीबी मुकाबला भी भाजपा की समीक्षा का हिस्सा हो सकता है। मुख्यमंत्री के गृहक्षेत्र से जुड़े निर्वाचन क्षेत्र में भाजपा उम्मीदवार को निर्दलीय प्रत्याशी से कड़ी चुनौती मिली। वरीयता मतों की गणना के पश्चात पार्टी जीत दर्ज करने में सफल रही। यह परिणाम बताता है कि शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में व्यक्तिगत पहचान और स्थानीय संपर्क भी महत्वपूर्ण योगदान दे सकते हैं।

समाजवादी पार्टी के उद्देश्य से यह चुनाव वर्ष 2020 के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन का अवसर बनकर प्रकाश में आया है। पिछले चुनाव में पार्टी ने तीन सीटें जीती थीं। इस बार बुधवार शाम तक वह चार सीटें जीत चुकी थी और पांचवीं सीट पर बढ़त बनाए हुए थी। यदि वाराणसी स्नातक सीट का अंतिम परिणाम उसके पक्ष में आता है, तो पिछले चुनाव की तुलना में उसकी सीटों की संख्या में दो का इजाफा होगा।

समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने चुनाव में जीत दर्ज करने वाले उम्मीदवारों और कार्यकर्ताओं को बधाई दी है। उन्होंने पार्टी कार्यकर्ताओं से अपील की कि जीत के पश्चात किसी प्रकार का जुलूस या ऐसा आयोजन न किया जाए जिससे विवाद के हालात पैदा हो। अखिलेश यादव ने कार्यकर्ताओं से शांतिपूर्ण तरीके से परिणामों का विवरण लोगों तक पहुंचाने और संगठनात्मक स्तर पर सक्रिय रहने को कहा।

अखिलेश यादव ने चुनाव प्रक्रिया और कुछ सीटों के परिणामों के सिलसिले में भाजपा तथा प्रशासन पर आरोप भी लगाए हैं। उन्होंने विशेष रूप से गोरखपुर के मुकाबले और वाराणसी की मतगणना का उल्लेख करते हुए सवाल उठाए। हालांकि ये समाजवादी पार्टी नेतृत्व के राजनीतिक आरोप हैं और इन्हें स्वतंत्र रूप से प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। संबंधित चुनाव प्रक्रिया के विषय में अंतिम निष्कर्ष आधिकारिक रिकॉर्ड और सक्षम संस्थाओं की जांच को आधार बनाकर ही निकाला जा सकता है।

सपा नेता शिवपाल सिंह यादव ने भी पार्टी उम्मीदवारों की जीत पर कार्यकर्ताओं को बधाई दी और आगामी विधानसभा चुनाव का उल्लेख किया। समाजवादी पार्टी नेतृत्व इन परिणामों को संगठन के उद्देश्य से उत्साह बढ़ाने वाले संकेत के रूप में प्रस्तुत कर रहा है। वहीं भाजपा अपने कुल छह सीटों के प्रदर्शन के संग उन क्षेत्रों की समीक्षा करने के हालात में है जहां उसे अपेक्षित परिणाम नहीं मिले।

इस चुनाव में सामाजिक समीकरणों की भी चर्चा रही। भाजपा ने विभिन्न सीटों पर ब्राह्मण, ठाकुर, सिख, वैश्य और अन्य सामाजिक समूहों से जुड़े उम्मीदवारों को मैदान में उतारा। समाजवादी पार्टी ने अपने पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक राजनीतिक दृष्टिकोण के संग अलग-अलग समुदायों के उम्मीदवारों को टिकट देने की रणनीति अपनाई। सपा ने यादव, कुर्मी, कायस्थ और वैश्य समुदायों से जुड़े उम्मीदवारों के माध्यम से विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में समर्थन जुटाने का प्रयास किया।

हालांकि विधान परिषद के शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के परिणामों को सीधे प्रदेश के सभी मतदाताओं की राजनीतिक पसंद का प्रतिनिधि नहीं माना जा सकता। इन चुनावों में मतदाता बनने के उद्देश्य से अलग पात्रता शर्तें होती हैं और मतदाता सूची भी सामान्य विधानसभा चुनावों से भिन्न होती है। शिक्षक निर्वाचन क्षेत्रों में पात्र शिक्षकों और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों में पंजीकृत स्नातक मतदाताओं की भागीदारी होती है। इस कारण इन चुनावों के सामाजिक और राजनीतिक निष्कर्ष निकालते समय मतदाता समूह की सीमाओं को ध्यान में रखना जरूरी है।

उत्तर प्रदेश में वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव के सिलसिले में राजनीतिक गतिविधियां धीरे-धीरे तेज हो रही हैं। भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों अपने संगठन को मजबूत करने, सामाजिक समर्थन का विस्तार करने और स्थानीय स्तर पर सक्रियता बढ़ाने के कोशिश में लगी हैं। विधान परिषद चुनाव के परिणाम इन दलों को अपनी रणनीति की समीक्षा करने का अवसर देते हैं। विशेष रूप से जिन सीटों पर अप्रत्याशित परिणाम सामने आए हैं, वहां संगठनात्मक और स्थानीय कारणों का आकलन महत्वपूर्ण रहेगा।

भाजपा के सामने चुनौती उन क्षेत्रों में अपनी स्थिति का विश्लेषण करने की होगी जहां वह पहले जीतती रही है लेकिन इस बार हार गई। दूसरी ओर समाजवादी पार्टी के उद्देश्य से चुनौती विधान परिषद चुनाव में मिले समर्थन को लंबे समय तक बनाए रखने और व्यापक संगठनात्मक गतिविधियों से जोड़ने की होगी। दोनों दलों के उद्देश्य से शिक्षक और स्नातक मतदाताओं से जुड़े मुद्दों को समझना भी महत्वपूर्ण रहेगा।

इन चुनावों के परिणामों ने यह भी स्पष्ट किया है कि स्थानीय उम्मीदवारों की पहचान, राजनीतिक दलों के बीच उम्मीदवारों का स्थानांतरण, संगठनात्मक संपर्क और निर्वाचन क्षेत्र की विशेष परिस्थितियां परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं। आगरा शिक्षक सीट इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण है, जहां पहले भाजपा से जुड़े रहे आकाश अग्रवाल ने सपा के टिकट पर जीत दर्ज की। इसी प्रकार लखनऊ स्नातक सीट पर सपा की सफलता ने स्थानीय चुनावी समीकरणों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

अभी के उद्देश्य से उत्तर प्रदेश विधान परिषद की 11 सीटों में से भाजपा की छह और समाजवादी पार्टी की चार सीटों पर जीत की पुष्टि हुई थी, वहीं वाराणसी-मिर्जापुर स्नातक निर्वाचन क्षेत्र में मतगणना जारी थी। अंतिम परिणाम आने के पश्चात ही सभी 11 सीटों की पूरी तस्वीर स्पष्ट होगी। राजनीतिक दृष्टि से इन चुनावों ने भाजपा और समाजवादी पार्टी दोनों को अलग-अलग संदेश दिए हैं। भाजपा ने अपना पिछला सीट आंकड़ा बनाए रखा है, वहीं समाजवादी पार्टी ने कुछ महत्वपूर्ण निर्वाचन क्षेत्रों में अपनी स्थिति मजबूत की है।

आने वाले समय में दोनों दल इन परिणामों का अपने-अपने संगठनात्मक और राजनीतिक दृष्टिकोण से विश्लेषण करेंगे। वर्ष 2027 के विधानसभा चुनाव से पूर्व यह मुकाबला राजनीतिक चर्चा का विषय जरूर बना है, लेकिन शिक्षक और स्नातक निर्वाचन क्षेत्रों के सीमित मतदाता आधार को मद्देनजर रखते हुए इन नतीजों से विधानसभा चुनाव का परिणाम तय करना संभव नहीं है। अभी के उद्देश्य से लखनऊ, आगरा, वाराणसी और गोरखपुर जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के नतीजों ने प्रदेश की राजनीति में नई बहस को जन्म दिया है।

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