
Delhi Air Pollution: चार दिन की राहत के बाद दिल्ली में फिर बढ़ा प्रदूषण, AQI 229 पहुंचा; विवेक विहार की हवा ‘बहुत खराब’, पराली से ज्यादा वाहनों का योगदान
नई दिल्ली। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में वायु प्रदूषण की समस्या एक बार फिर गंभीर होती दिखाई दे रही है। लगातार चार दिनों तक वायु गुणवत्ता मध्यम श्रेणी में रहने के पश्चात बुधवार, 28 अक्टूबर 2026 को दिल्ली की हवा दोबारा खराब श्रेणी में तक जा पहुंची। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के आंकड़ों के मुताबिक, राजधानी का औसत वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) 229 पंजीकृत किया गया। एक दिन पहले मंगलवार को यह 197 था। इस प्रकार महज 24 घंटे के भीतर वायु गुणवत्ता में गिरावट पंजीकृत की गई। सबसे चिंताजनक स्थिति पूर्वी दिल्ली के विवेक विहार इलाके में सामने आई, जहां AQI 316 तक जा पहुंचा और हवा बहुत खराब श्रेणी में पंजीकृत की गई। दिल्ली में अक्टूबर के अंतिम सप्ताह के समय प्रदूषण के स्तर में लगातार उतार-चढ़ाव देखा जा रहा है। महीने की 21 तारीख को राजधानी का AQI 245 पंजीकृत किया गया था, वहीं 22 अक्टूबर को यह 223 और 23 अक्टूबर को 230 रहा। उसके पश्चात चार दिनों तक हवा की गुणवत्ता में कुछ सुधार हुआ और प्रदूषण का स्तर मध्यम श्रेणी में बना रहा। हालांकि, बुधवार को यह राहत समाप्त हो गई और राजधानी की हवा एक बार फिर खराब श्रेणी में तक जा पहुंची। प्रदूषण के इस उतार-चढ़ाव ने आगामी दिनों में वायु गुणवत्ता के हालात के सिलसिले में चिंता बढ़ा दी है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मानकों के मुताबिक, AQI शून्य से 50 के बीच होने पर हवा अच्छी मानी जाती है। 51 से 100 के बीच संतोषजनक, 101 से 200 के बीच मध्यम, 201 से 300 के बीच खराब, 301 से 400 के बीच बहुत खराब और 401 से 500 के बीच गंभीर श्रेणी निर्धारित की गई है। बुधवार को दिल्ली का औसत AQI 229 होने की वजह से राजधानी की हवा खराब श्रेणी में रही। हालांकि, विभिन्न इलाकों में प्रदूषण का स्तर एक जैसा नहीं था।
दिल्ली के कुल 58 वायु गुणवत्ता निगरानी केंद्रों में से 41 केंद्रों पर हवा खराब श्रेणी में पंजीकृत की गई, वहीं 16 केंद्रों पर वायु गुणवत्ता मध्यम रही। विवेक विहार का AQI 316 दर्ज होने के संग यह राजधानी का सबसे प्रदूषित निगरानी केंद्र रहा। इस आंकड़े से स्पष्ट होता है कि शहर के कुछ हिस्सों में प्रदूषण का स्तर औसत से काफी अधिक है। ऐसे इलाकों में लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से आम लोगों को सांस संबंधी परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।
राजधानी में प्रदूषण बढ़ने के पीछे केवल पराली जलाने को जिम्मेदार मानना सही नहीं होगा। दिल्ली की वायु गुणवत्ता प्रबंधन से संबंधित डिसीजन सपोर्ट सिस्टम के आकलन के मुताबिक, बुधवार को प्रदूषण में सबसे बड़ा योगदान परिवहन क्षेत्र का रहा। वाहनों से निकलने वाले उत्सर्जन की हिस्सेदारी 19.3 प्रतिशत पंजीकृत की गई। इसके मुकाबले पराली जलाने का योगदान केवल 0.9 प्रतिशत रहा। ये आंकड़े दर्शाते हैं कि दिल्ली के भीतर मौजूद प्रदूषण स्रोत भी वायु गुणवत्ता को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
डिसीजन सपोर्ट सिस्टम के मुताबिक, परिवहन के अलावा ऊर्जा क्षेत्र से 5 प्रतिशत, दिल्ली और आसपास के औद्योगिक क्षेत्रों से 4.8 प्रतिशत तथा घरेलू गतिविधियों से 5.1 प्रतिशत प्रदूषण का योगदान पंजीकृत किया गया। निर्माण गतिविधियों की हिस्सेदारी 2.5 प्रतिशत रही, वहीं कचरा जलाने से 1.8 प्रतिशत और सड़कों की धूल से 1.3 प्रतिशत प्रदूषण का योगदान सामने आया। अन्य स्थानीय स्रोतों की हिस्सेदारी भी लगभग 1.3 प्रतिशत रही। इन आंकड़ों से पता चलता है कि वाहनों, उद्योगों, घरेलू ईंधन, निर्माण गतिविधियों और खुले में कचरा जलाने जैसे कई स्रोत मिलकर राजधानी की हवा को प्रभावित कर रहे हैं।
दिल्ली की वायु गुणवत्ता पर राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के आसपास के जिलों का भी असर पड़ रहा है। आकलन के मुताबिक, बुधवार को गाजियाबाद से प्रदूषण का योगदान 11.8 प्रतिशत पंजीकृत किया गया। गौतमबुद्धनगर की हिस्सेदारी 8.7 प्रतिशत, मेरठ की 8.6 प्रतिशत, मुजफ्फरनगर की 5.7 प्रतिशत, बागपत की 4.2 प्रतिशत और बुलंदशहर की 3.9 प्रतिशत रही। इसी प्रकार फरीदाबाद से 3.06 प्रतिशत, गुरुग्राम से 2.1 प्रतिशत, सोनीपत से 1.5 प्रतिशत और झज्जर से 0.5 प्रतिशत योगदान का अनुमान सामने आया। ये आंकड़े इस बात की ओर संकेत करते हैं कि दिल्ली की प्रदूषण समस्या को केवल राजधानी की सीमाओं के भीतर नियंत्रित करना पर्याप्त नहीं होगा।
पराली जलाने की घटनाओं पर नजर डालें तो भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI) की दैनिक रिपोर्ट के मुताबिक, 27 अक्टूबर को छह राज्यों में खेतों में आग लगने की कुल 129 घटनाएं उपग्रह के माध्यम से पंजीकृत की गईं। इनमें राजस्थान में सबसे अधिक 46 मामले सामने आए। पंजाब में 33, मध्य प्रदेश में 24, उत्तर प्रदेश में 18, उत्तराखंड में सात और हरियाणा में एक घटना पंजीकृत की गई। खेतों में फसल अवशेष जलाने की ये घटनाएं मौसमी प्रदूषण की समस्या का हिस्सा हैं, हालांकि बुधवार के आकलन में दिल्ली के प्रदूषण में इनकी हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम रही।
15 सितंबर से 27 अक्टूबर के बीच छह राज्यों में फसल अवशेष जलाने की कुल 2,267 घटनाएं पंजीकृत की गईं। इनमें पंजाब में 717, राजस्थान में 533, मध्य प्रदेश में 510, उत्तर प्रदेश में 324, उत्तराखंड में 159 और हरियाणा में 22 घटनाएं शामिल रहीं। इसी अवधि में दिल्ली में भी खेतों में आग लगने की दो घटनाएं पंजीकृत की गईं। इन आंकड़ों से पता चलता है कि फसल अवशेष जलाने की समस्या कई राज्यों में मौजूद है और इसके प्रभाव का आकलन मौसम तथा हवा की दिशा के संग करना जरूरी है।
प्रदूषण के स्तर में बदलाव के पीछे मौसम संबंधी परिस्थितियां भी महत्वपूर्ण योगदान देती हैं। हवा की गति कम होने पर वातावरण में मौजूद प्रदूषक कण तेजी से फैल नहीं पाते और जमीन के नजदीक जमा होने लगते हैं। दिल्ली की वायु गुणवत्ता पूर्व चेतावनी प्रणाली के मुताबिक, जब वेंटिलेशन इंडेक्स 6,000 वर्ग मीटर प्रति सेकंड से कम और हवा की औसत गति 10 किलोमीटर प्रति घंटे से कम होती है, तब प्रदूषकों का फैलाव प्रभावित हो सकता है। ऐसी परिस्थितियों में प्रदूषण का स्तर बढ़ने की आशंका रहती है।
हालांकि, आने वाले दिनों के उद्देश्य से मौसम संबंधी पूर्वानुमान कुछ राहत का संकेत दे रहे हैं। दिल्ली की वायु गुणवत्ता पूर्व चेतावनी प्रणाली के मुताबिक, 29 से 31 अक्टूबर के बीच राजधानी की हवा मध्यम श्रेणी में रहने की संभावना है। उसके पश्चात अगले छह दिनों के समय वायु गुणवत्ता मध्यम से खराब श्रेणी के बीच बनी रह सकती है। भारतीय मौसम विभाग ने गुरुवार को आसमान में सामान्य रूप से बादल छाए रहने और मध्यम बारिश की संभावना जताई है। शुक्रवार को गरज के संग बारिश होने का भी पूर्वानुमान है। बारिश और हवा की गति में बदलाव से वातावरण में मौजूद प्रदूषक कणों के स्तर पर असर पड़ सकता है।
दिल्ली में खराब वायु गुणवत्ता का सबसे अधिक प्रभाव उन लोगों पर पड़ सकता है, जिन्हें पहले से सांस संबंधी बीमारियां हैं। बच्चों, बुजुर्गों और अस्थमा जैसी समस्याओं से जूझ रहे आम लोगों को प्रदूषण के समय विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। खराब श्रेणी की हवा में लंबे समय तक रहने से सांस लेने में असुविधा हो सकती है, वहीं बहुत खराब श्रेणी में लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहना स्वास्थ्य के उद्देश्य से अधिक जोखिम पैदा कर सकता है।
विशेषज्ञों की सामान्य स्वास्थ्य सलाह के मुताबिक, प्रदूषण अधिक होने पर अनावश्यक बाहरी गतिविधियों को सीमित करना, अत्यधिक प्रदूषित सड़कों के आसपास लंबे समय तक रहने से बचना और स्थानीय वायु गुणवत्ता का विवरण नियमित रूप से देखना उपयोगी हो सकता है। बाहर जाना आवश्यक होने पर अच्छी तरह फिट होने वाला N95 मास्क सूक्ष्म कणों के संपर्क को कम करने में मदद कर सकता है। हालांकि, प्रदूषण से सुरक्षा के उद्देश्य से व्यक्तिगत सावधानियों के संग-साथ उत्सर्जन स्रोतों पर नियंत्रण भी जरूरी है।
दिल्ली-एनसीआर में प्रदूषण नियंत्रण के उद्देश्य से ग्रेडेड रिस्पॉन्स एक्शन प्लान (GRAP) के अंतर्गत भी विभिन्न उपाय लागू किए जाते हैं। 21 अक्टूबर को वायु गुणवत्ता खराब श्रेणी में पहुंचने के पश्चात वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग ने GRAP के पहले चरण को लागू किया था। इसके अंतर्गत सड़कों की मशीनों से सफाई, पानी का छिड़काव, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण और खुले में कचरा जलाने के विरुद्ध कार्रवाई जैसे उपाय शामिल हैं। प्रदूषण नियंत्रण के इन उपायों का उद्देश्य स्थानीय उत्सर्जन को कम करना और हवा की गुणवत्ता में सुधार लाना है।
बुधवार के आंकड़ों ने एक बार फिर स्पष्ट किया है कि दिल्ली में प्रदूषण की समस्या कई स्रोतों से जुड़ी हुई है। वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक गतिविधियां, घरेलू उत्सर्जन, सड़क की धूल और आसपास के जिलों से आने वाला प्रदूषण मिलकर राजधानी की वायु गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। पराली जलाने की घटनाएं भी मौसमी प्रदूषण का हिस्सा हैं, लेकिन हर दिन इसकी हिस्सेदारी अलग-अलग हो सकती है। ऐसे में प्रभावी नियंत्रण के उद्देश्य से अलग-अलग स्रोतों के योगदान को ध्यान में रखकर कदम उठाना आवश्यक है।
अभी के उद्देश्य से राजधानी के नागरिकों की नजर आगामी दिनों के मौसम और वायु गुणवत्ता के पूर्वानुमान पर बनी हुई है। यदि बारिश और हवा की अनुकूल परिस्थितियां बनती हैं तो प्रदूषण के स्तर में अस्थायी सुधार देखने को मिल सकता है। हालांकि, लंबे समय तक स्वच्छ हवा सुनिश्चित करने के उद्देश्य से परिवहन उत्सर्जन, औद्योगिक प्रदूषण, निर्माण स्थलों की धूल और कचरा जलाने जैसी गतिविधियों पर लगातार नियंत्रण जरूरी रहेगा। बुधवार को AQI 229 पहुंचने और विवेक विहार में 316 दर्ज होने से यह स्पष्ट है कि अक्टूबर के अंतिम दिनों में दिल्ली की वायु गुणवत्ता अब भी चिंता का विषय बनी हुई है।






