
Parliament Bills 2026: संसद में ऐतिहासिक बदलाव की तैयारी, महिला आरक्षण और परिसीमन विधेयक पेश
संसद में आज देश के राजनीतिक ढांचे से जुड़े दो बड़े बदलावों की नींव रखी जा रही है। केंद्र सरकार लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में सीटों के पुनर्गठन और महिला आरक्षण से जुड़े अहम विधेयक पेश करने जा रही है, जिससे आने वाले समय में भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में बड़े परिवर्तन देखने को मिल सकते हैं।
यह पूरा मामला संविधान संशोधन और परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा है, जिसके तहत लोकसभा और सभी राज्यों व केंद्रशासित प्रदेशों की विधानसभाओं में सीटों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा गया है। इसके लिए संविधान (131वां संशोधन) विधेयक पेश किया जाएगा, जिसमें महिला आरक्षण को भी शामिल किया गया है। इसके अलावा परिसीमन विधेयक और केंद्रशासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक भी संसद में पेश किए जाएंगे।
सरकार का कहना है कि लंबे समय से लोकसभा सीटों की संरचना में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ है, क्योंकि 1976 के बाद से इसमें कोई संशोधन नहीं किया गया। ऐसे में अब जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के संतुलन को ध्यान में रखते हुए नया परिसीमन समय की आवश्यकता बन गया है। सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस प्रक्रिया में किसी भी राज्य के साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा और सभी राज्यों को समान रूप से प्रतिनिधित्व का अवसर मिलेगा।
प्रस्ताव के अनुसार लोकसभा में कुल सीटों की अधिकतम सीमा 850 तक निर्धारित की जा सकती है। सरकार का दावा है कि सीटों में बढ़ोतरी सभी राज्यों के लिए लगभग समान अनुपात में होगी और किसी भी राज्य की सीटों में कटौती नहीं की जाएगी।
दक्षिण भारतीय राज्यों को इस बात की आशंका है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन के कारण उन्हें कम सीटें मिल सकती हैं, लेकिन सरकार ने इन चिंताओं को खारिज करते हुए कहा है कि किसी भी राज्य के साथ अन्याय नहीं होगा। परिसीमन प्रक्रिया 2011 की जनगणना के आधार पर आगे बढ़ाई जाएगी और इसके लिए अलग-अलग राज्यों में परिसीमन आयोग गठित किए जाएंगे, जो सभी राजनीतिक दलों से चर्चा के बाद अंतिम निर्णय लेंगे।
वहीं, विपक्ष इस प्रस्ताव को लेकर असहमति जता रहा है। कांग्रेस के नेतृत्व में कई विपक्षी दल परिसीमन के कुछ प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं, जबकि महिला आरक्षण को लेकर आम सहमति बनती दिख रही है। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने पहले ही महिला आरक्षण को एक ऐतिहासिक कदम बताया है, जिसे देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की दिशा में बड़ा बदलाव माना जा रहा है।
यह संसद सत्र आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतंत्र की दिशा और प्रतिनिधित्व की संरचना को गहराई से प्रभावित कर सकता है और इसे एक ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जा रहा है।






