
Rajasthan Nikay Election: राजस्थान निकाय चुनाव में BJP का दबदबा, 309 निकायों में 163 पर जीत; कांग्रेस को 103, निर्दलीयों ने भी दिखाया दम
जयपुर। राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव 2026 के नतीजों में भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी बढ़त हासिल की है। राज्य के 309 नगरीय निकायों के घोषित परिणामों में भाजपा ने 163 निकायों में जीत दर्ज की है, जबकि कांग्रेस के खाते में 103 निकाय आए हैं। 43 निकायों में निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाजी मारी है। वार्ड स्तर पर भी भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर सामने आई है। देर शाम तक सामने आए 9,900 वार्डों के परिणामों में भाजपा ने 4,026, कांग्रेस ने 3,438 और निर्दलीय उम्मीदवारों ने 2,436 वार्डों में जीत हासिल की।
राजस्थान में नगर निगम, नगर परिषद और नगरपालिका के चुनाव दो चरणों में कराए गए थे। पहले चरण का मतदान 9 सितंबर को हुआ था, जिसमें 162 नगरीय निकाय शामिल थे। इसके बाद 11 सितंबर को दूसरे चरण में 147 निकायों के लिए वोट डाले गए।
दूसरे चरण में जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर और पाली जैसे बड़े शहरों के निकाय चुनाव भी शामिल थे। दोनों चरणों का मतदान पूरा होने के बाद सोमवार सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू हुई।
मतगणना के शुरुआती दौर से ही कई स्थानों पर भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधा मुकाबला दिखाई दिया। जैसे-जैसे परिणाम सामने आते गए, भाजपा ने बढ़त बनानी शुरू कर दी।
निकायों के अंतिम परिणामों में भाजपा ने 309 में से 163 पर जीत हासिल की। कांग्रेस 103 निकायों में विजयी रही, जबकि 43 निकाय निर्दलीयों के खाते में गए।
वार्ड स्तर के परिणामों में भी भाजपा ने बढ़त बनाए रखी। शाम तक घोषित 9,900 वार्डों में भाजपा के 4,026 उम्मीदवार जीत चुके थे। कांग्रेस के 3,438 उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की, जबकि 2,436 वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवार सफल रहे।
इन नतीजों से राजस्थान की शहरी राजनीति में भाजपा की मजबूत स्थिति सामने आई है। हालांकि कांग्रेस ने भी कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में भाजपा को कड़ी चुनौती दी और कुछ ऐसे इलाकों में जीत हासिल की, जिन्हें भाजपा के लिए मजबूत माना जाता रहा है।
राजस्थान के 10 प्रमुख नगर निगमों के परिणामों पर सबसे ज्यादा नजर रही। जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर, पाली, अलवर, भरतपुर, बीकानेर और भीलवाड़ा के नतीजे राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
कोटा नगर निगम में भाजपा ने स्पष्ट बढ़त हासिल की। यहां 100 वार्डों में भाजपा ने बहुमत का आंकड़ा पार करते हुए 51 सीटों पर जीत दर्ज की। कांग्रेस को 33 सीटें मिलीं, जबकि अन्य उम्मीदवारों ने भी कुछ वार्डों में जीत हासिल की।
वहीं कुछ नगर निगमों में भाजपा और कांग्रेस के बीच बेहद करीबी मुकाबला देखने को मिला। कई सीटों पर परिणाम अंतिम दौर तक दोनों दलों के लिए तनावपूर्ण बने रहे।
राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के राजनीतिक प्रभाव वाले झालावाड़ में कांग्रेस ने भाजपा को बड़ा झटका दिया। झालावाड़ नगर परिषद के 45 वार्डों में कांग्रेस ने 29 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया।
झालावाड़ और झालरापाटन क्षेत्र लंबे समय से वसुंधरा राजे और उनके परिवार का मजबूत राजनीतिक क्षेत्र माना जाता रहा है। झालावाड़-बारां लोकसभा क्षेत्र से वसुंधरा राजे के बेटे दुष्यंत सिंह लगातार पांच बार सांसद चुने जा चुके हैं।
ऐसे में झालावाड़ नगर परिषद में कांग्रेस की जीत को स्थानीय राजनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण परिणाम माना जा रहा है।
जयपुर नगर निगम के चुनाव पर भी पूरे प्रदेश की नजर रही। राजधानी होने के कारण यहां के नतीजों को भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई माना जा रहा था।
जयपुर के 150 वार्डों में दोनों प्रमुख पार्टियों के बीच कई स्थानों पर कड़ा मुकाबला देखने को मिला। इस बार भाजपा ने कुछ मुस्लिम उम्मीदवारों को भी चुनाव मैदान में उतारा था, जिसके कारण पार्टी की रणनीति चर्चा में रही।
राजस्थान के निकाय चुनावों में निर्दलीय उम्मीदवारों का प्रदर्शन भी महत्वपूर्ण रहा है। 2,400 से अधिक वार्डों में निर्दलीय उम्मीदवारों की जीत ने यह साफ कर दिया कि कई क्षेत्रों में स्थानीय चेहरे और स्थानीय मुद्दे राजनीतिक दलों पर भारी पड़े हैं।
43 निकायों में निर्दलीयों की जीत के कारण आने वाले समय में बोर्ड गठन के दौरान उनकी भूमिका भी महत्वपूर्ण हो सकती है।
निकाय चुनाव के परिणाम केवल पार्षदों की जीत तक सीमित नहीं हैं। अब अगला बड़ा राजनीतिक मुकाबला नगर निगमों में महापौर, नगर परिषदों में सभापति और नगरपालिकाओं में चेयरमैन पद को लेकर होगा।
इन पदों के लिए 21 सितंबर को चुनाव प्रक्रिया आयोजित की जानी है। ऐसे में जिन निकायों में किसी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है, वहां निर्दलीय पार्षद निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
यही कारण है कि चुनाव परिणाम आने से पहले ही भाजपा और कांग्रेस अपने उम्मीदवारों और संभावित विजयी पार्षदों को लेकर सतर्क हो गई थीं। कुछ स्थानों पर हॉर्स ट्रेडिंग की आशंका के बीच प्रत्याशियों को रिसॉर्ट में ठहराए जाने की चर्चा भी सामने आई।
निकाय चुनावों को राजस्थान की भजनलाल शर्मा सरकार के लिए भी महत्वपूर्ण राजनीतिक परीक्षा माना जा रहा था। विधानसभा चुनाव के बाद शहरी मतदाताओं के बीच सरकार और भाजपा की स्थिति को इन परिणामों के जरिए परखा जा रहा है।
दूसरी तरफ कांग्रेस ने स्थानीय मुद्दों और राज्य सरकार के कामकाज को चुनाव प्रचार का प्रमुख मुद्दा बनाया था। पार्टी ने कई क्षेत्रों में मजबूत प्रदर्शन किया, लेकिन पूरे प्रदेश के आंकड़ों में भाजपा उससे आगे रही।
नगर परिषद और नगरपालिकाओं के परिणामों में भी दोनों पार्टियों के बीच कई जगह सीधी टक्कर देखने को मिली। स्थानीय उम्मीदवारों की व्यक्तिगत पकड़ ने भी कई सीटों पर चुनाव परिणाम प्रभावित किए।
चुनाव में कई दिलचस्प नतीजे भी सामने आए। कुछ ऐसे वार्ड रहे जहां प्रमुख राजनीतिक दलों के उम्मीदवार बेहद कम वोट हासिल कर पाए, जबकि स्थानीय और निर्दलीय उम्मीदवारों ने बड़े दलों को पीछे छोड़ दिया।
नतीजों के बाद अब भाजपा और कांग्रेस दोनों की नजर बोर्ड गठन पर है। जिन निकायों में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला है, वहां स्थिति काफी हद तक साफ है, लेकिन त्रिशंकु परिणाम वाले निकायों में राजनीतिक जोड़तोड़ तेज हो सकती है।
निर्दलीय पार्षद ऐसे निकायों में महापौर, सभापति और चेयरमैन के चुनाव की दिशा तय कर सकते हैं। इसलिए दोनों प्रमुख दल निर्दलीयों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर सकते हैं।
राजस्थान निकाय चुनाव के परिणामों ने राज्य की शहरी राजनीति की नई तस्वीर सामने रखी है। भाजपा 163 निकायों और 4,026 वार्डों में जीत के साथ सबसे आगे रही है, जबकि कांग्रेस ने 103 निकायों और 3,438 वार्डों में जीत दर्ज की है। निर्दलीय उम्मीदवारों ने 43 निकायों और 2,436 वार्डों में जीत हासिल कर अपनी मजबूत मौजूदगी दर्ज कराई है।
अब राजनीतिक निगाहें 21 सितंबर को होने वाले महापौर, सभापति और नगरपालिका चेयरमैन के चुनाव पर टिकेंगी। खासकर उन निकायों में मुकाबला दिलचस्प रहने की संभावना है, जहां किसी भी दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है और सत्ता की चाबी निर्दलीय पार्षदों के हाथ में है।






